सुप्रीम कोर्ट में दर्ज प्राइवेट स्कूलों की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हीं को लपेटे में लेते हुए कई सवाल किए। कोर्ट ने पूछा कि जब स्कूलों में क्लासेस ऑनलाइन हो रही हैं तो अभिभावकों से पूरी फीस की वसूली क्यों? फिलहाल इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लॉकडाउन के दौरान स्कूल पूरी फीस की वसूली नहीं कर सकता है। सभी स्कूलों को अपनी स्कूल फीस पर स्वेच्छा से ही 15% की छूट देनी चाहिए। 


कोरोना काल के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित शैक्षणिक संस्थान हुए हैं। 2020 मार्च में लगे लॉकडाउन से ही सभी शैक्षणिक संस्थान बंद हैं और विद्यार्थियों को ऑनलाइन क्लासेस के जरिए पढ़ाया जा रहा है। इस समय सबसे बड़ा सवाल स्कूल की फीस को लेकर खड़ा हुआ है कि जब स्कूलों में क्लासेस ऑनलाइन माध्यमों से हो रही हैं तब स्कूल पूरी फीस कैसे वसूल सकता है। ऑनलाइन क्लासेस के दौरान जब सभी स्कूल बंद हैं तब स्कूल प्रबंधन ने पानी, बिजली, पेट्रोल, डीजल, रखरखाव शुल्क और स्टेशनरी जैसे मुद्दों पर लागत की बचत की होगी। जिसे लेकर अभिभावकों ने फीस कटौती की बातें भी कही थी।


क्या है पूरा मामला -

दरअसल इस मुद्दे की शुरुआत राजस्थान से हुई जहाँ राजस्थान सरकार ने डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 की धारा 72 के मद्देनजर राज्य के 36,000 सहायता प्राप्त निजी और 220 अल्पसंख्यक स्कूलों को वार्षिक फीस में 30% की कटौती करने का आदेश दिया। इसके विरोध में संविधान के अनुच्छेद 19.1.जी के तहत स्कूलों को व्यवसाय करने के लिए प्राप्त मौलिक अधिकार का हनन मानते हुए स्कूलों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।


न्यायमूर्ति खानविलकर ने सुनवाई के दौरान कहा कि स्कूल 2019-20 के शैक्षणिक सत्र की पूरी फीस 2016 के कानून के तहत निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप वसूल सकते हैं, लेकिन 2020-21 के शैक्षणिक सत्र के लिए विद्यार्थियों द्वारा इस्तेमाल में नहीं की गई सुविधा की फीस नहीं वसूल सकते हैं। इसलिए उन्हें अपनी फीस में 15% की कटौती करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि एक निजी संस्थान को अपनी फीस तय करने की स्वायत्तता तब ही तक है जब तक उसका परिणाम मुनाफाखोरी और व्यावसायीकरण नहीं होता है और राज्य को इसे लेकर फैसले लेने का पूरा अधिकार है।