3 मई को सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग द्वारा दर्ज याचिका पर सुनवाई हुई। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मद्रास हाई कोर्ट के तीखे मौखिक टिप्पणियों को दवा की कड़वी खुराक समझ निगल लेने को कहा। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान चुनावी रैलियों में भारी भीड़ होने से कोरोना के बढ़ते खतरे को देखकर और इस पर चुनाव आयोग की लापरवाहियों को देखते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग पर टिप्पणी देते हुए कहा था कि चुनाव आयोग कोविड की दूसरी लहर के लिए अकेले जिम्मेदार है। जिसके खिलाफ चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।


चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी अपनी दलील में कहते हैं कि इस तरह की कठोर टिप्पणी किसी भी संवैधानिक प्राधिकारी के खिलाफ नहीं किया जा सकता है। जिसके जवाब में न्यायमूर्ति शाह कहते है की कभी कभी न्यायाधीश सार्वजनिक हित के नजरिए से यह बातें कहते हैं, कभी-कभी परिस्थितियों को देख वे नाराज और निराश होते हैं, आखिर वो भी इंसान है। आपको इसे सही भावना में लेना चाहिए। 


द्विवेदी कहते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में लगातार हाई कोर्ट की टिप्पणी वाली बात आग की तरह फैल रही है। जिससे पूरे देश में चुनाव आयोग की छवि ऐसी बन रही है कि कोरोना फैलाने का जिम्मेदार केवल आयोग ही है। आखिर आयोग यह कैसे तय कर सकता है कि रैलियों में आने वाली जनता मास्क पहन कर आए। 


3 मई के दिन सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के ऊपर मद्रास हाई कोर्ट द्वारा लगाए मौखिक आरोपों को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई हुई। इस सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग द्वारा मीडिया को मौखिक टिप्पणियों की रिपोर्टिंग करने से रोकने की प्रार्थना पर न्यायालय ने आपत्ति जताई। चुनाव आयोग ने कहा की ऐसे हत्या का आरोप लगाना सही नहीं है और जज अपने आदेश में यह बात शामिल करें कि उन्होंने यह बात किस लहजे में कही गई। इस पर जस्टिस शाह ने आपत्ति जताते हुए कहा कि जजों की बातचीत पर टिप्पणी करना एक मानवीय प्रक्रिया है। कोर्ट आयोग की बात को समझता है लेकिन वह जमीनी स्तर पर काम करने वाले उच्च न्यायालयों का मनोबल नहीं घटाना चाहते। कोर्ट आयोग को यह भी आश्वासन देता हैं कि बेशक वो संवैधानिक संस्था है लेकिन न्यायिक प्रक्रिया से नहीं बच सकते हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने यह बात भी साफ कर दी कि कोर्ट में किसी भी मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों द्वारा की मौखिक टिप्पणियों को लेकर मीडिया को रिपोर्टिंग करने से नहीं रोका जा सकता है। कोर्ट में होने वाली सुनवाई जनता के हित के लिए है और यह जानना उनके लिए जरूरी है कि न्यायिक प्रक्रिया किस तरह से काम कर रही है। अदालती चर्चाओं की रिपोर्टिंग न्यायिक प्रक्रिया में लोगों के विश्वास को और गहरा करेगी।