नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री का आगमन

आज 2 अप्रैल दिन शनिवार को नवरात्रि का पहला दिन यानी मां शैलपुत्री का दिन है। नवरात्रि के 9 दिनों तक माता रानी के नौ रूपों का अलग ढंग से पूजा करने का विधान है। हालांकि आपको तो पता ही होगा कि मां के नौ रूपों का दर्शन करना कितना फलदाई होता है। और नौ रूपों का नाम भी पता होगा लेकिन। हम आपको फिर से बताते हैं कि माता रानी के नौ रूपों का क्या नाम है।

मां के नौ रूपों का नामशैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और अंतिम है सिद्धिदात्री.

हालांकि पहले दिन मां शैलपुत्री का दर्शन करने का विधान है (हिंदी न्यूज़)। इस दिन माता का पूजा करना चाहिए शैलपुत्री माता की कथा कहनी चाहिए। इनकीआरती भी करनी चाहिए। आपको बता दें कि मां शैलपुत्री को ही माता सती के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार माता सती के विवाह करने के बाद अपने पिता के द्वारा अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाए और खुद को अग्नि में ध्वस्त कर दिया। यानी आत्मदाह कर दिया। यह भी पढ़ें-भविष्य में बद्रीनाथ और केदारनाथ तीर्थ स्थल हो जाएंगे गायब

फिर उन्होंने हिमाचल की पुत्री बनकर यानी पार्वती के रूप में जन्म लिया इसलिए माता पार्वती को भी शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है। शास्त्र में मां शैलपुत्री के रूप का वर्णन करते हुए लिखा है कि माता शैलपुत्री वृषभ पर सवार संपूर्ण हिमालय पर विराजमान है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल जो dhram अर्थ और मोक्ष के द्वारा संतुलन का प्रतीक है। और बाएं हाथ में कमल पुष्प कीचड़ यानी फूल जगत में रहकर उससे परे रहने का संकेत देता है। आज नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री का पूजन करते हैं।

माता सती कैसे बनी मां शैलपुत्री?

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार प्रजापति दक्ष ने एक यज्ञ किया जिसमें उन्होंने महादेव को आमंत्रित नहीं किया और माता सती जिन्होंने पिता के विरोध में जाकर महादेव से विवाह की थी जिससे प्रजापति दक्ष सती के साथ-साथ महादेव से भी कुपित थे और इसी कारणवश उन्होंने महादेव को यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया। जब सती अपने पिता के घर पहुंची तो उन्होंने वहां महादेव का स्थान ना पाकर क्रोधित हो गई और अपने पिता से महादेव को ना बुलाने का कारण पूछा प्रजापति दक्ष ने महादेव का घोर अपमान किया माता सती ने उसी समय अपने पिता के घर पर ही जहां उनके पिता यज्ञ कर रहे थे.

Navratri puja उसे यज्ञ कुंड में ही अपने आप को आत्मदाह कर दिया। फिर कुछ समय बाद ही उन्होंने हिमाचल पर्वत पर राजा हिमावन के यहां जन्म लिया जहां इनका नाम पार्वती पड़ा। पार्वती जी ने बचपन से ही महादेव की आराधना करनी शुरू कर दी थी। उन्होंने महादेव को बचपन से ही अपना पति मान लिया था। हालांकि इस जन्म में भी उनको महादेव से विवाह करने में कुछ बाधाएं उत्पन्न हुई लेकिन फिर सब सही हो गया। इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। क्योंकि इन्होंने वर्षो तपस्या करके महादेव को प्रसन्न किया जिसके फलस्वरूप इनको वरदान में महादेव के भक्ति के साथ-साथ उनके अर्धांगिनी होने का भी वरदान मिला।
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