वैसे तो हर एक एकादशी का अपना ही महत्व होता है लेकिन षटतिला एकादशी का एक अलग ही महत्व है साथ ही आपको बता दें कि जितने भी एकादशी हैं उसमें विष्णु भगवान को केले का भोग लगाया जाता है लेकिन अगर बात करें षटतिला एकादशी की तो इसमें तिल के लड्डू का बेहद महत्व बताया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह जो समय चल रहा है वह माघ के महीने का कृष्ण पक्ष चल रहा है और साथ ही बता दें कि इस माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी षटतिला एकादशी के नाम से विख्यात है ऐसे में श्रद्धालु अपनी अपनी इच्छा भगवान के सामने रखते हैं और उनका व्रत करते हैं पूजन करते हैं साथ ही यथाशक्ति भोग चढ़ाते हैं। साथ ही आपको बता दें कि षटतिला एकादशी के दिन पानी में तिल डालकर नहाने का महत्व बताया गया है जिससे आपके सभी पाप धोते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है. विष्णु भगवान की कृपा आप पर हमेशा बनी रहती है।


कब होगी षटतिला एकादशी?

अब हम आपको इसके शुभ मुहूर्त के बारे में बताएंगे और यह भी बताएंगे कि कब इसका पारण करना है और कब इसकी शुरुआत होगी. ज्योतिषी के अनुसार आगामी 28 जनवरी शुक्रवार को 2:00 बज कर 16 मिनट पर यह व्रत शुरू होगी और इस व्रत का समापन 28 जनवरी को ही रात में 11:35 पर हो जाएगी तो ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि 28 जनवरी को ही इस षटतिला एकादशी का व्रत रखा जाएगा साथी आपको बता दें कि षटतिला एकादशी का व्रत का पारण 29 जनवरी को किया जाएगा।


क्यों तिल का महत्व है इस व्रत में?


ज्यादातर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि इस एकादशी में तिल का महत्व क्यों है और किसी प्रसाद का क्यों नहीं. आपको बता दूं जैसा कि नाम से ही लगता है की इसमें तिल का महत्व है इस व्रत का नाम ही षटतिला है इससे साफ है कि षटतिला एकादशी में तिल का बहुत महत्व है इसलिए इस व्रत में विष्णु भगवान को तिल के लड्डू बेहद पसंद हैं और जो पानी में तिल डालकर स्नान करते हैं और भगवान की पूजा करते हैं जिससे भगवान उनकी सभी मनोकामना को पूर्ण करते हैं।


क्या विधि है इस व्रत की?

बताया जाता है की एकादशी से 1 दिन पहले यानी दशमी की संध्या को सूर्यास्त से पहले साधारण भोजन कर ले उसके बाद कुछ नहीं खाना चाहिए साथ ही सुबह षटतिला एकादशी वाले दिन जल्दी उठकर पानी में तिल डालकर स्नान करना चाहिए उस दिन सिर नहीं धोना चाहिए साथ ही पूजा करने का स्थान भी साफ करना चाहिए शुद्ध देसी घी का दीपक जलावे साथ ही भगवान के पास बैठकर एकादशी व्रत करने का संकल्प लें इसके बाद यथाशक्ति चंदन, पुष्प, धूपबत्ती, नोवैद्यम, फूल माला, तुलसी, पंचामृत, आदि से भगवान की पूजा करें तथा भोग लगावे उसके बाद भगवान की आरती से पूजा का समापन करें प्रसाद में भगवान को दिल से बने पदार्थों से भोग लगाएं वैसे तो अगर आप चाहे तो आप निराहार रहकर भी व्रत रख सकते हैं लेकिन अगर संभव नहीं है तो आप एक समय भोजन कर सकते हैं साथ ही अगर आप जल ग्रहण करते हैं तो उसमें तिल का मिश्रण अवश्य होना चाहिए ताकि आपका व्रत अच्छे से पूर्ण हो सके साथ ही व्रत के आखिरी दिन स्नानादि करके ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान देना चाहिए।