द ट्रेड के अनुसार भारत 3.5 -4  लाख टन गेहूँ को अपने पडोसी देशों को निर्यात कर सकता है| इन देशों में दक्षिण-पूर्वी और पश्चिम एशिया के देश शामिल हैं| पिछले वर्ष की तुलना मई में यह कहीं ज्यादा अधिक है, जो केवल 0.18 लाख टन तक ही सिमित था | यह विशाल निर्यात तभी मुमकिन है, जब सरकार निर्यात के कर व् नियमों में नर्मी बरतेगी |

भारत को वर्तमान को देखते हुए और भविष्य की चिंता करते हुए यह फैसला लेना होगा | इसकी सब से बड़ी वजह यह है कि भारत में आकड़ों पर जोर देते हुए देखें तो अभी 56 लाख टन गेहूँ के भंडार हैं|  इस 56 लाख टन में सरकारी और निज़ी  दोनों भण्डारण शामिल हैं | इस मौजूदा गेहूं के भंडारों को मार्च तक तात्कालिक रूप से खाली करना नितांत आवश्यक है क्योंकि अप्रैल तक भारत में गेहूँ की नई फसल कटकर तैयार होगी और सरकारी व निज़ी भण्डारकों को उसके लिए अपने भंडारों को खाली करने की जरुरत है | यह कदम अर्थव्यवस्था  की नजर से भी अच्छा है क्योंकि इस से सरकार का व्यापार घाटा  काम होगा और किसानो को वापस गेहूँ के खरीद से आमद होगी और पैसा सीधा किसान व मजदूर वर्ग के हाथों में जायेगा | जिस से अर्थवयवस्था में गति मिलने की उम्मीद है | 

इस दिशा में कई व्यपारिक संघों ने सर्कार से अलग अलग शिफारिशें भी की हैं और निर्यात के लिए सकारात्मक रुझान दिखाए हैं | यह स्थिति यूक्रैन और रूस जैसे गेहूँ के मुख्या निर्यातक देशों में फसल अच्छी ना होने के कारण उत्पन्न हुई है, जिसका फायदा निश्चित रूप से भारत को उठाना चाहिए और बड़े बाज़ारों तक अपनी फसल को पहुँचाना चाहिए |