आज-कल के दौर में हम सभी लोग व्यस्त रहते हैं। सभी के ऊपर प्रेशर रहता है अब वो काम का प्रेशर हो या जिंदगी से जुड़ी किसी बात का। हम अपनी ज़िंदगी में जो भी कुछ करते हैं और हमारी जो भी कुछ आदतें होती हैं उसकी सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि यह कोरोना का दौर चल रहा है और इस दौर में ज्यादातर लोगों को ऑनलाईन काम करना पड़ता है जिसकी वजह से लोगों का स्क्रीन टाईम पहले के मुताबिक अब ज्यादा बढ़ गया है। यहाँ पर स्क्रीन टाईम का मतलब कंप्यूटर, मोबाईल, टीवी की स्क्रीन को देखते हुए जो समय लगा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ का कहना है कि यह स्क्रीन टाईम जो बड़ा है वह सेहत के लिए काफी नुकसानदायक है।  

आपको बता दें कि "द लैंसेट डिजिटल हेल्थ जर्नल" में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसके अध्ययन में शोधकर्ताओं ने लोगों को एक बड़े खतरे के लिए आगाह किया है। अध्ययनकर्ताओं को कहना यह है कि जैसे-जैसे स्क्रीन टाईम बढ़ रहा है बच्चों और युवाओं में मायोपिया का जोखिम पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है। अगर समय रहते इससे बचाव के उपाय नहीं किए गए तो हो सकता है कि आगे आने वाले सालों में ज्यादातर लोग इस समस्या से ग्रस्त हो सकते हैं। वैज्ञानिकों को कहना है कि पहले के समय में मायोपिया का खतरा ज्यादातर उम्र बढ़ने के साथ लोगों को हुआ करता था लेकिन अब जिस तरह से लोगों को स्क्रीन ज्यादा फेस करनी पड़ रही है तो इस वजह से बच्चे और युवा भी इसका शिकार बन रहे हैं। 

सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, चीन और यूके के शोधकर्ताओं और नेत्र स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बढ़ते हुए स्क्रीन टाईम और मायोपिया के खतरे को जानने के लिए विस्तृत अध्ययन किया है। इसके लिए 3 महीने से लेकर 33 साल की उम्र के बच्चों और व्यस्कों के आखों की जाँच की गई थी। इन सभी में देखा गया कि स्क्रीन टाईम ज्यादा काफी ज्यादा रहा है। अध्ययन के विश्र्लेक्षण के आधार पर शोधकर्ताओं ने बताया कि जिस तरह से स्क्रीन टाईम बढ़ रहा है उस हिसाब से मायोपिया के खतरा 30% तक बढ़ सकता है। इसी के साथ कंप्यूटर भी ज्यादा इस्तेमाल करने से यह जोखिम बढ़कर यह करीब 80% तक बढ़ गया है। 

नेत्र रोग विशेषज्ञों के मुताबिक मायोपिया में रोगी को पास की चीज़ें साफ दिखाई देंगी और दूर की चीज़ें धुंधली दिखाई पड़ेंगी। इसमें आँख का आकार भी बदल जाता है। आँखों को सुरक्षा देने वाली बाहरी परत जिसे कॉर्निया कहते हैं उसके बढ़ने कारण ही ऐसा होता है। और ऐसी स्थिति में आँखों में आने वाला प्रकाश सही ढ़ंग से फोकस नहीं कर पाता। 

इसका अध्ययन करने के दौरान शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कोरोना के कारण स्कूल बंद हुए और बच्चों ने ऑनलाईन शिक्षी ली और मोबाईल फोन जैसी स्क्रीन वाली चीज़ों का इस्तेमाल ज्यादा किया है। स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल और ज्यादा अधिक समय के लिए इस्तेमाल की आदत बच्चों और युवाओं में मायोपिया का खतरा बढ़ा रहा है। एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी(एआरयू) में विजन और एंड आई रिसर्च इंस्टीट्यूट में ऑप्थल्मोलॉजी के प्रोफेसर बॉर्न का यह कहना है कि साल 2050 तक लगभग आधी वैश्विक आबादी मायोपिया का शिकार बन सकती है। इस संकट को देखते हुए लोगों को अभी से ही सावधानी बरतने की ज़रूरत है। प्रोफेसर बॉर्न कहते हैं कि स्कूल बंद होने की वजह से बच्चों को ऑनलाईन क्लासेज लेनी पड़ी और युवाओं को वर्क फ्रोम होम करना पड़ा। अध्ययन में यह पाया गया कि इलेकेट्रोनिक उपकरणों में से नीली रोशनी निकलती है जो कि सीधे तौर पर आँखों पर प्रभाव डालती हैं। मायोपिया के साथ-साथ अन्य समस्याओं को खतरा भी बढ़ जाता है। आपको बता दें कि दुनिया के लगभग सभी हिस्सों से ही मायोपिया के बढ़ते मामले सामने आ रहे हैं। सीधे तौर पर समझा जाए तो यह है कि अगर हमने अभी समय रहते सावधानियाँ नहीं बरती तो आगे चलकर एक गंभीर समस्या में हम घिर सकते हैं।