भारतीय फिल्मों के परिप्रेक्ष्य में गुरुदत्त का नाम अविस्मरणीय है। अपने छोटे से फिल्मी सफर में उन्होंने भारतीय सिनेमा को कई आयाम दिए। उनकी फिल्मों में तत्कालीन सिनेमाई दौर के कई आधुनिक बिंबों और गीतों का प्रयोग दिखता है। एक समय में जब भारतीय समाज नेहरू युग के आदर्शवादी खांचे में रखकर ही घटनाओं को देखता था, उस समय गुरुदत्त की फिल्मों ने इस मोह को तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने  नेहरू युगीन नोस्टाल्जिया के बीच इस समय की हताशा को अपनी फिल्मों में तरजीह दी। इस प्रकार गुरुदत्त ने कमर्शियल सिनेमा से इतर समानांतर सिनेमा का एक खाका खींचा जिसने भारत में कला फिल्मों के लिए पथ प्रदर्शक का काम किया। 


एक ओर जहां इटालियन सिनेमा के न्यूरोलॉजिस्ट आंदोलन से प्रभावित होकर भारतीय सिनेमाकारों ने तमाम राजनीतिक वादों और स्वर्णिम भारत के सपने को लेकर फिल्में बनाने की कोशिश की तो वहीं दूसरी ओर सत्यजित रे और उनके समकालीन गुरुदत्त सरीखे कलाकारों ने यथार्थवादी सिनेमा की नींव रखी।


गुरुदत्त ने 1940 के दशक में अभिनय की शुरुआत की और एक बेहतरीन कथाकार के रूप में खुद को स्थापित किया। इस समय तक भारत स्वतंत्र हो चुका था और देश में सिनेमा का विकास भी शुरू हो चुका था। यहीं से सिनेमा की दो धाराएं निकलीं।  एक ओर जहां इटालियन सिनेमा के न्यूरोलॉजिस्ट आंदोलन से प्रभावित होकर भारतीय सिनेमाकारों ने तमाम राजनीतिक वादों और स्वर्णिम भारत के सपने को लेकर फिल्में बनाने की कोशिश की तो वहीं दूसरी ओर सत्यजित रे और उनके समकालीन गुरुदत्त सरीखे कलाकारों ने यथार्थवादी सिनेमा की नींव रखी। उन्होंने भारत में व्याप्त गरीबी, वेश्यावृत्ति, बेरोजगारी  और सामाजिक शोषण को अपनी फिल्मों में जगह दी। 


अपनी  कालजयी फ़िल्म प्यासा में गुरुदत्त ने अपने किरदार विजय के माध्यम से एक ऐसे समाज का चित्र खींचा जहां भविष्य तो सुनहरा है लेकिन वर्तमान अंधकार के गर्भ में है। फ़िल्म में विजय का किरदार गरीब और बेरोजगार है जिसे अपना उपन्यास छापवाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। इस फ़िल्म के माध्यम से गुरुदत्त तत्कालीन सत्ताधारी समाज में आ रही कमियों को बखूबी दर्शाते हैं। विजय का किरदार लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के प्रति हताश हो जाता है। और यही हताशा फ़िल्म में विजय को आत्म-विनाश की ओर ले जाती है। प्यासा फ़िल्म एक हार की कविता है जहां किरदार यह पाता है कि एक स्वर्णिम देश का सपना दरअसल छलावा भर है और जिस देश का सपना लोग देख रहे हैं वह अभी भी दूर की कौड़ी है। इसी फ़िल्म में वह एक वेश्या से प्रेम का दृश्य भी खींचते हैं जहां वह एक ढलते कवि को संभालने में उसकी मदद करती है। फ़िल्म में उन्होंने बीच का अशरीरी प्रेम दर्शाया जो कि भारतीय सिनेमा की दृष्टि में नवाचार था।


गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों में जिन विषयों को चुना उनमें से ज्यादातर समाज के प्रतिबंधित विषय रहे। इन विषयों पर बात करने का साहस और श्रेय उन्हें दिया जाता है। उनकी फिल्मों में महिला प्रधान विषयों और उनकी संवेदनाओं को भी केन्द्रीय महत्व मिला जोकि इससे पहले विरले ही होता था।


फ़िल्म कागज के फूल में वह समाज के प्रतिष्ठित आयामों को तोड़ने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। इस फ़िल्म में गुरुदत्त ने विवाहेतर संबंधों का ताना बाना पेश करते हुए एक मानवीय परिदृश्य तैयार किया। यह फ़िल्म उनकी आत्मकथा भी मानी जाती है। स्वतंत्रता के समय समाज में विवाहेतर संबंधों को भारत में एक प्रतिबंधित विषय माना जाता था जिसे गुरुदत्त ने अपनी फ़िल्म में जगह दी।  वहीं ‘साहब बीबी और गुलाम’ में उन्होंने एक अकेली महिला का पराए पुरुष से प्रेम का कथानक चुना जिसने उन्हें समकालीन निर्देशकों से अलग खड़ा किया। यह बहुत ही संवेदनशील विषय था जिसे गुरुदत्त ने बेहद मानवीय ढंग से पेश किया। वहीं चौदहवीं का चाँद में उन्होंने प्रेम के त्रिकोण को फिल्माया। 


गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों में जिन विषयों को चुना उनमें से ज्यादातर समाज के प्रतिबंधित विषय रहे। इन विषयों पर बात करने का साहस और श्रेय उन्हें दिया जाता है। उनकी फिल्मों में महिला प्रधान विषयों और उनकी संवेदनाओं को भी केन्द्रीय महत्व मिला जोकि इससे पहले विरले ही होता था।  इन सबके अलावा बेहतरीन कैमरा तकनीक, पटकथा और अच्छी कविताओं को गीतों की शक्ल देने का गुरुदत्त का प्रयोग उन्हें महान निर्देशकों की श्रेणी में रखता है। गुरुदत्त के फिल्मी करियर में नेहरू युगीन नोस्टाल्जिया के प्रभाव से लेकर इस युग के प्रति हताशा की यात्रा दिखाई देती है। उन्होंने देश के यथार्थ को सबके सामने रखा शायद यही वजह रही कि उनकी फिल्में उनके जीवनकाल में प्रशंसा नहीं बटोर पाई। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि गुरुदत्त की फिल्मों में दुखांत प्रेम की अभिव्यक्ति है, व्यवस्था के चंगुल में फंसने की छटपटाहट और निराशा है और एक स्वर्णिम वादे से मोहभंग होने की स्थिति भी दिखती है। निश्चित तौर पर  इन्हीं तत्वों ने गुरुदत्त को महान निर्देशकों और कलाकारों की श्रेणी में ला खड़ा किया।