यह 1893 में बाल गंगाधर तिलक द्वारा पुनर्जीवित किया गया।फिर ये  गणेश चतुर्थी एक बड़ी तैयारी के साथ एक वार्षिक घरेलू त्योहार के रूप में हिंदू लोगों द्वारा नाना शुरू किया गया।इस त्यौहार को मनाने के पीछे का मकसद लोगों के बीच एकता का भाव उत्पन्न करना था। 


 सभी त्योहारों की अपनी-अपनी  मान्यताएं है।उन्हीं में से एक खास पर्व है- गणेश चतुर्थी।

क्योंकि गणेश चतुर्थी के पर्व पर पूजा होने की सही तारीख किसी को ज्ञात नहीं है, हालांकि इतिहास के अनुसार यह अनुमान लगाया गया है कि गणेश चतुर्थी 1630- 1680 के दौरान छत्रपति शिवाजी (मराठा साम्राज्य के संस्थापक) के समय में एक सार्वजनिक समारोह के रूप में बनाया जाती थी। शिवाजी के समय यह गणेश गणेश उत्सव उनके समराज्य के कुल देवता के रूप में नियमित रूप से मनाना शुरू हो गया था। पेशवा के अंत के पश्चात यह पारिवारिक बना रहा।

यह 1893 में बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक (एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक )द्वारा पुनर्जीवित किया गया।फिर ये  गणेश चतुर्थी एक बड़ी तैयारी के साथ एक वार्षिक घरेलू त्योहार के रूप में हिंदू लोगों द्वारा बनाना शुरू किया गया।इस त्यौहार को मनाने के पीछे का मकसद लोगों के बीच एकता का भाव उत्पन्न करना था। 

चलिए यह तो बात रही यह उत्सव कब प्रारंभ हुआ,किसने कहा और इसके इसका क्या उद्देश्य था। अब थोड़ा आगे चलते हैं और बात कर लेते हैं, इस त्यौहार के पीछे लोगों के जुड़े उनके विश्वास की,आस्था की भाव की और उनकी भक्ति की।

 गणेश चतुर्थी हिंदुओं का प्रमुख पर्व है। जो भारत के विभिन्न भागों में मनाया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र इसका प्रमुख केंद्र है। लोगों की  मान्यताएं है कि भादो मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इसलिए उनके भक्त प्रत्येक वर्ष की भांति शुक्ल पक्ष चतुर्थी को उनके जन्म दिवस के रूप में यानी गणेश चतुर्थी के रूप में बनाते हैं। इस पर्व में विघ्नहर्ता की पूजा की जाती है तथा भक्त उनका अपने अपने घरों में बड़ी ही धूमधाम से स्वागत करते हैं। और आसपास के लोग इस समारोह में शामिल होते हैं।

प्रथम पूज्य श्री गणेश की पूजा 9 दिनों तक की जाती है, 9 दिन पश्चात गाने और बाजू के साथ उनकी प्रतिमा को तलाब इत्यादि जल में विसर्जित कर दिया जाता है।

इस खास दिन के पीछे का एक खास रहस्य_

लोगों का कहना है कि इस दिन चंद्रमा के सामने भूलकर भी नहीं जाना चाहिए,उसके दर्शन नहीं करने चाहिए। पर क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों कहा जाता है ,इसके पीछे का राज क्या है,क्या कहानी है आखिर  वजह क्या है। 

लोगों का मानना है कि जो व्यक्ति इस दिन चंद्रमा के दर्शन करता है उसे कलंक लग जाता है। ऐसा कहा जाता है कि  इस  दिन चंद्रमा को देखना निषेध है। दरअसल इस  रहस्य के बारे में एक कथा प्रचलित है।  पुराणों में ऐसा वर्णन है कि गणेश जी ने चांद को श्राप दिया था कि उनका दर्शन करके इंसान कलंक का  भागीदार बनेगा। एक बार गणेश जी मूषक की सवारी करते वक्त  गिर गए,जिसे देखकर चंद्रमा ने उनका काफी मजाक उड़ाया। जिस पर विघ्नहर्ता क्रोधित हो गए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दे दिया। उन्होंने  डांटते हुए चंद्रमा से कहा कि मुसीबत के वक्त सहायता करने की बजाय  मजाक उड़ाने वाले चांद, मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि आज के बाद तुम इस विशाल गगन पर राज नहीं कर सकोगे। कोई भी तुम्हारी रोशनी को महसूस नहीं कर सकेगा। चंद्रमा यह श्राप सुनते ही अत्यंत दुखी हो गए और माफी की आस रखते हुए गणेश जी के पैरों में गिर गए। चंद्रमा की इस दशा को देखकर सभी देवगण चिंतित हो गए और विनायक से प्रार्थना करने लगे। तब जाकर गणेश जी ने कहा कि मैं अपना शाप वापस तो नहीं ले सकता। किंतु उसका असर कम कर सकता हूं, इसका असर केवल एक माह में एक बार होगा। इसके  पश्चात तुम फिर चमकने लगोगे।  15 दिन के अंतराल में तुम अपने संपूर्ण वेश में नजर आने लगोगे। क्योंकि तुमने मेरा अपमान चतुर्थी के दिन किया है, इसलिए जो भी व्यक्ति तुम्हें इस दिन देखेगा वह भी कलंकित होगा।

 यदि कोई व्यक्ति भूलवश इस दिन चंद्रमा को देख ले तो वह इस कलंक से कैसे छुटकारा पा सकता है। इस कलंक से बचने के लिए इस मंत्र का उच्चारण करें

भाद्रशुक्लचतुथ्रयायो ज्ञानतोअज्ञानतोअपिवा।

अभिशापीभवेच्चन्द्रदर्शनाद्भृशदु:खभाग्॥