किसानों का आंदोलन भारत में आंदोलन की नई परिभाषा बनेगा| पिछले 38 दिनों में किसान अपनी मांगों से एक भी इंच पीछे नहीं हुए हैं| आज जब दिल्ली में बारिश हो रही है तब किसान ठिठुरती ठंढ में अपनी मांगों को लेकर सरकार से लड़ रहे हैं| तमाम अजेंडों के बीच उनका आंदोलन अभी भी बचा हुआ है| 7 दौर की वार्ताओं में किसान अपनी मांग से टस से मस नहीं हुए हैं| इस बीच कल यानी 4 जनवरी को किसान फिर से सरकार से बातचीत करेंगे| किसान नेताओं का कहना है कि कल अगर किसानों और सरकार के बीच का गतिरोध खत्म नहीं होता है तो यह आंदोलन अपने अगले चरण की ओर बढ़ेगा| उन्होंने 4 जनवरी से लेकर गणतंत्र दिवस तक की अपनी पूरी रूपरेखा विस्तार से बताई है| संयुक्त किसान मोर्चा के किसानों का कहना है कि अगर 4 जनवरी को सरकार किसानों की बात नहीं मानती है तो  हरियाणा में मॉल और पेट्रोल पंप बंद किए जाएंगे | इसके अलावा  कुंडली-मानेसर राजमार्ग पर एक ट्रैक्टर मार्च आयोजित किया जाएगा | जयपुर और  दिल्ली  राजमार्ग पर मार्च करने की बात भी किसान कह रहे हैं| किसान गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर परेड निकालने की तैयारी  मे हैं|  अगर किसानों की यह परेड निकलती है तो यह देखना भी दिलचस्प होगा क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसान अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे होंगे | 

इस आंदोलन से पता चलता है कि किसानों के पास एक बेहतर आउट्लुक है, उनकी कार्यशैली बताती है कि उनके पास आंदोलन का एक बेहतर अनुभव है| अपनी मांगों पर अड़े रहने के लिए उन्हें लड़ना आता है| किसान नेता राकेश सिंह टिकैत ने कहा कि सरकार किसानों के आंदोलन को हल्के में ले रही है | शाहीन बाग से आंदोलन की तुलना करके टिकैत ने सरकार को चेताया है कि शाहीन बाग में सरकार प्रदर्शन को तितर बितर करने में सक्षम थी , इसलिए उन्हें लगता है कि वे हमारे साथ भी ऐसा ही कर सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं होगा| सरकार इस बयान को किस तरह लेती है ये 4 जनवरी की बातचीत में दिख सकता है| 

किसानों और सरकार के बीच तनातनी का माहौल भी है| सरकार का कहना है कि किसानों की 50 प्रतिशत मांगें मान ली गई है और बाकी मांगों पर 4 जनवरी को सुलह हो जाएगी वहीं किसान कह रहे हैं कि सरकार ने जो दो मांगें मानी हैं वह उनकी कुल मांगों का मात्र 5 प्रतिशत है| यहाँ देखना दिलचस्प होगा कि सरकार कैसे इस 50 और 5 प्रतिशत का अंतर कम करेगी| हाल ही में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री का बचाव करते दिखे| एक महत्वपूर्ण और सटीक बात उन्होंने कही कि प्रधानमंत्री के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए और राजनीतिक समझ बनने के बाद से  उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्रियों को लेकर भी अपशब्द नहीं कहे| जाहिर सी बात है यह कहते समय उन्हें अपनी पार्टी के तमाम वो नेता याद या गए होंगे जो पूर्व प्रधनमंत्रियों पर ओछी टिप्पणियों को अपना अधिकार समझ चुके हैं| इसके अलावा विपक्षी नेता राहुल गांधी पर तंज कसते हुए उन्होंने खुद को किसानी की बेहतर समझ वाला मंत्री बताया| राजनाथ सिंह ने कहा कि किसानों के लिए उनके दिल में सम्मान है और उनके सामने सिर झुक हुआ है | लेकिन अपने ही मंत्रियों के बयानों से रक्षामंत्री किस प्रकार पार्टी की छवि बचाएंगे? 

किसानों ने हाल ही में 3 भाजपा नेताओं को लीगल नोटिस भेजा है किसानों का आरोप है कि इन नेताओं ने किसान आंदोलन का अपमान किया है| इन नेताओं में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल और भाजपा नेता राम माधव शामिल हैं| तीनों नेताओं ने किसान आंदोलन में राजनीति, विदेशी ताकतों और खलिस्तान के समर्थकों की बात कही थी| गुजरात के उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने किसानों के बारे में छींटाकशी करते हुए कहा कि  हम उन्हें पिज्जा, पकौड़ी खाते हुए देख सकते हैं ... जो सब कुछ मुफ्त मिल रहा है ... राष्ट्र-विरोधी तत्व उन्हें रहने के लिए लाखों रुपये दे रहे हैं ... " जाहीर है इस प्रकार के बयान पार्टी और सरकार की दोहरी तस्वीर सामने रखती है| सरकार को ऐसी बयानबाजियों से बचना चाहिए| 

इस बीच किसान आंदोलन में 50 से भी ज्यादा किसानों की मौत हो चुकी है| कल एक किसान ने दिल्ली -गाजीपुर बॉर्डर पर आंदोलन के बीच एक टॉइलेट मे फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली| आत्महत्या करने वाले सरदार कश्मीर सिंह ने अपने सुसाइड नोट में कहा है कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली गाजीपुर बॉर्डर पर ही हो| अपने सुसाइड नोट में सरदार सिंह ने सरकार को अपनी मौत का जिम्मेदार बताया| सवाल ये है कि भरी ठंढ से और आत्महत्या करने वाले इन किसानों की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा| इस बीच  बहुत संभव है कि किसान आंदोलन के खिलाफ तमाम बातें और दावे आप तक पहुँच  रहे हों| नेताओं के भाषणों में भी आप बड़े स्तर पर जहर की मात्रा देख सकते हैं| अक्सर विपक्ष की साजिश और भोले भाले किसानों को भड़काने के कई दावे मिल जाएंगे| समझ नहीं आता कि इन दावों को किस तरह से देखा जाए| किसान इतने भोले हैं कि अब तक के सबसे कमजोर विपक्ष के बहकावे में या गया है? अगर हाँ तो देश में सबसे बड़े जनादेश वाली पार्टी 38 दिनों से किसानों को समझा क्यों नहीं पा रही है ?


 बहरहाल 4 जनवरी एक अहम दिन है| सरकार बैकफुट पर है | किसान अपनी एमएसपी के कानूनी अधिकार और सभी कानूनों  को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं|  देखना होगा कि किसानों और सरकार के बीच का यह गतिरोध कितना लंबा खिंचेगा| और कितने दिन यह आंदोलन जारी रहेगा और अभी और कितनी शहादतें इस आंदोलन में और देखनी पड़ेंगी|