चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है और देवी को नौ दिनों तक सभी रूपों में सजाकर पूजा किया जाता है, देवी के नौ रूपों की पूजा के बीच व्रत और अन्य धार्मिक कार्यक्रम भी होते हैं

हम आज यहां  बलूचिस्तानमें स्तित हिंगलाज मन्दिर की  बात कर रहे है। यह मंदिर 2000 वर्ष से अधिक पुराना है, हालांकि यह हिंदुओं की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है, जबकि मुस्लिम भी बड़ी संख्या में यहां दर्शन करने के लिए आते हैं। इसे एक बहुत ही चमत्कारी स्थान माना जाता है और तीर्थस्थल को "नानी की हज" के नाम से जाना जाता है, यहां कहा जाता है कि इस शक्तिपीठ की देखभाल स्थानीय मुसलमानों द्वारा की जाती है।

हिंगलाज माता मंदिर एक हिंदू मंदिर है जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के हिंगलाज में हिंगोल नदी के तट पर स्थित है। यह हिंदू देवी सती को समर्पित 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां इस देवी को हिंगलाज देवी या हिंगुला देवी भी कहा जाता है। इस मंदिर को नानी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस जगह ने पिछले तीन दशकों में अपार लोकप्रियता हासिल की है और पाकिस्तान में कई हिंदू समुदायों के बीच विश्वास का केंद्र बन गया है।

हिंगलाज माता का गुफा मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत मे दूरस्थ, पहाड़ी क्षेत्र में एक संकरी घाटी में स्थित है। यह कराची से उत्तर-पश्चिम में 250 किलोमीटर, अरब सागर से 12 मील अंतर्देशीय और सिंधु के मुहाने से 80 मील पश्चिम में स्थित है। यह मकरान रेगिस्तान में खेरथार पहाड़ियों की एक श्रृंखला के अंत में हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। यह क्षेत्र हिंगोल नेशनल पार्क के अंतर्गत आता है। यहां मंदिर में देवी की कोई मानव निर्मित छवि नहीं है। मंदिर एक छोटी सी प्राकृतिक गुफा में बना हुआ है। जहां एक मिट्टी की वेदी बनी हुई है। यहां देवी की कोई मानव द्वारा बनाई हुई छवि नहीं है। बल्कि, एक छोटे आकार की चट्टान को हिंगलाज माता की प्रतिकृति के रूप में पूजा जाता है। चट्टान सिंदूर से ली गई है।

हिंगलाज के आसपास, गणेश देव, माता काली, गुरूगोरख नाथ डौनी, ब्रह्म कुध, तिर कुंड, गुरुनानक खारो, रामजरोखा बेथक, अनिल कुंड, चोरसी पर्वत, चंद्र गोप, खिवार और अघोर जैसे कई अन्य प्रतिष्ठित स्थान हैं।

एक लोक कथा के अनुसार, बारां और राजपुरोहित की कुलदेवी हिंगलाज थीं, जिनका निवास स्थान पाकिस्तान के बालूचिस्तान प्रांत में था। हिंगलाज राजपुरोहित के अलावा, हिंगलाज देवी का चरित्र या इसका इतिहास अभी भी अस्पष्ट है।