पिछले सप्ताह संसद में दिल्ली के उपराज्यपाल के अधिकार को लेकर एक बिल संसोधित किया गया है। इसमें दिल्ली के उपराज्यपाल के अधिकार पहले से और भी स्पष्ट किए गए हैं। हालांकि समय-समय पर दिल्ली को और अधिकार देने या उसे पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग होते आ रही है। लेकिन देश की राजधानी होने के कारण केंद्र सरकार ने उसके अधिकार सीमित ही रखें हैं। उपराज्यपाल को अधिक अधिकार प्रदान कर एक तरह से केंद्र द्वारा ही दिल्ली को संचालित किया जाएगा। राज्यों के राज्यपाल की अपेक्षा में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के रूप में उपराज्यपाल के पास अधिक शक्ति मौजूद है। अगर दिल्ली की बात करें तो दिल्ली सरकार के पास अन्य राज्यों की तरह पुलिस कानून एवं व्यवस्था और भूमि संबंधी अधिकार नहीं हैं। हालांकि दिल्ली के पास विधानसभा है लेकिन राज्य सरकार इन तीन विषयों से जुड़े कानून नहीं बना सकती। दिल्ली सरकार के पास विशेष रूप से शिक्षा स्वास्थ्य परिवहन पेयजल संबंधित अधिकार हैं। 


यदि दिल्ली में उपराज्यपाल को और अधिकार देने वाला बिल कानून का रूप लेता है तो उनकी शक्तियां और भी मजबूत हो जाएंगी। अब दिल्ली सरकार या उसकी कैबिनेट की ओर से कोई भी प्रशासनिक फैसला लिया जाता है तो उसमें उपराज्यपाल की मंजूरी बेहद जरूरी होगी। दिल्ली विधानसभा के पास उपराज्यपाल की मंजूरी के बिना प्रशासनिक प्रभाव वाले कोई भी कानून बनाने का या लागू करने का अधिकार नहीं होगा। दिल्ली के विकास को देखकर देश ही नहीं दुनिया, भारत की बढ़ती हुई ताकत और उसकी आर्थिक क्षमता का मूल्यांकन करती है। 


आजादी के बाद हमारा लोकतंत्र मजबूत और परिपक्व हो चुका है, तब इस बात पर विशेष चर्चा होनी चाहिए कि अन्य राज्यों की सरकार की तरह केंद्र शासित राज्यों की सरकार क्यों नहीं चलती है। दिल्ली में केंद्र की सत्ता भी काम करती है, लेकिन यहाँ कुछ ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है कि स्थानीय नगर निगम, दिल्ली विश्वविद्यालय, विकास प्राधिकरण, अस्पतालों के साथ कानून और व्यवस्था दिल्ली सरकार के अधीन रहे। अगर केंद्र को यह आशंका हो की दिल्ली सरकार उसके काम में अड़ंगा लगा सकती है या फिर उसके जरूरतों को पूरा करने में बाधक बन सकती है तो कानून कि व्यवस्था कुछ इस प्रकार बनाई जा सकती है कि दिल्ली सरकार कुछ भी ऐसा ना कर सके।