इस कारण वर्ष भगवान शिव ने अपना स्थान भगवान विष्णु को दिया

जो जाए बद्री वह ना आए ओदरी अर्थात जो बद्रीनाथ के दर्शन कर ले उस इंसान को दोबारा मां के गर्भ में आने की जरूरत नहीं पड़ती हैं। उत्तराखंड राज्य में अलकनंदा के किनारे और नर-नारायण के पहाड़ों के बीच बसा है भगवान विष्णु का वैकुंठ लोक जिसे आज दुनिया बद्रीनाथ के नाम से जानती हैं। जो भारत के चार धामों में से एक हैं।

हिंदू शास्त्र के अनुसार बद्रीनाथ की यात्रा के बिना सारे तीर्थ यात्राएं अधूरी हैं।जब-जब धरती पर अधर्म का बोझ बढ़ा हैं तब-तब अपने भक्तों को कष्टों से उभारने के लिए भगवान विष्णु ने जन्म लिया हैं। जिस तरह त्रेतायुग में रामेश्वरम, द्वापर युग का द्वारका और कलयुग का धाम जगन्नाथ पुरी को माना गया हैं उसी तरह सतयुग का धाम बद्रीनाथ को माना गया हैं।

माना जाता है कि बद्रीनाथ धाम में आज भी भगवान विष्णु, बद्रीनारायण के रूप में तप कर रहे हैं। कहते है यहां जो भी आता है उसकी मनोकामना पूरी जरूर होती हैं। भगवान बद्री के दर्शन की उम्मीद लिए, मन में आस्था का दीप जलाए भारी संख्या में भक्तों की यहां कतार लगती हैं।


सतयुग के बद्रीनाथ मंदिर का रहस्य

हिंदुओं के चार धाम में द्वारका ,रामेश्वर ,जगन्नाथ और बद्रीनाथ प्रमुख है लेकिन जब व्यक्ति वृंदावन दर्शन करने जाता है तब उसे गंगोत्री, यमुनोत्री और केदारनाथ के भी दर्शन करनी चाहिए।केदारनाथ को जहां भगवान शंकर के आराम करने का स्थान माना गया है वही बद्रीनाथ को सृष्टि का आठवां वैकुंठ कहा गया हैं जहां भगवान विष्णु 6 महीने निंद्रा अवस्था में रहते हैं और 6 महीने जागते हैं।

यहाँ बद्रीनाथ भगवान की प्रतिमा शालिग्राम शिला से बनी हुई है और चतुरभुज ध्यान मुद्रा में है।

बद्रीनाथ मंदिर का नाम बद्रीनाथ इसलिए पड़ा क्योंकि यहां प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली जंगली बेर को बद्री कहते हैं। पुराणों के अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में वर्तमान बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्य वर्दी नामक एक तीर्थ का उदम होगा।

यह भी मान्यता है कि जोशीमठ में स्थित नरसिंह भगवान की मूर्ति का एक हाथ साल दर साल पतला होता जा रहा है, जिस दिन यह हाथ लुप्त हो जाएगा उस दिन केदारनाथ तीर्थ स्थल और बद्रीनाथ भी लुप्त होना प्रारंभ हो जाएंगे।

भगवान विष्णु के प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3133 मीटर के ऊंचाई पर स्थित हैं और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य आठवीं शताब्दी के दर्शनिक संत ने इसका निर्माण करवाया था। इसके पश्चिम में 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बद्रीनाथ शिखर की ऊंचाई 7138 मीटर है।

कहा यह भी जाता है कि जब भगवान विष्णु ध्यान योग में लीन थे तब बहुत ही अधिक हिमपात होने लगा, भगवान विष्णु और उनका घर हिम में पूरी तरह से डूबने लगा यह देखकर माता लक्ष्मी व्याकुल हो उठी तब उन्होंने खुद भगवान विष्णु के समीप खड़े होकर बेर के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगी।

भगवान लक्ष्मी जी भगवान विष्णु को वर्षा और हिम से बचाने के लिए कठोर तपस्या में जुट गई।कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु का तब पूरा हुआ तो देखा कि लक्ष्मी जी हिम से ढकी पड़ी हैं।

तब उन्होंने माता लक्ष्मी को देख कर के कहा कि मेरे साथ तो आपने भी तप किया है तो इसलिए इस धाम पर मेरे साथ तुम्हें ही पूजा जाएगा और तुमने मेरी रक्षा बद्री वृक्ष के रूप में की है इसलिए आज से मेरा नाम बद्रीनाथ के नाम से दुनिया में प्रसिद्ध होगा।


बद्रीनाथ मंदिर की खास बातें

बद्रीनाथ मंदिर के बारे में कहा जाता है कि पहले यहां पर भगवान शिव का वास होता था पर भगवान विष्णु ने इस स्थान को भगवान शिव से मांग लिया था। बद्रीनाथ को शास्त्रों में दूसरा वैकुंड कहा जाता है जहां भगवान विष्णु विराजमान हैं।

पहला वैकुंठ क्षीर सागर को कहा जाता हैं। मान्यता है कि जब केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं तब मंदिर में जलने वाले दीपक को देखने का खास महत्व हैं। ऐसा माना जाता है कि 6 महीने इस बंद दरवाजे के अंदर देवता इस दीपक को जलाए रखते हैं



अलकनंदा

अलकनंदा नदी बद्रीनाथ के चरण पखारती हैं। कहा जाता है कि सतयुग तक यहां भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन हुआ करते थे। त्रेतायुग में देवताओं और साधुओं को यहां भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन मिलते थे। द्वापर युग में जब भगवान विष्णु, श्री कृष्ण रूप में अवतार लेने वाले थे उस समय भगवान ने यह नियम बनाया कि अब मनुष्य को केवल उनके विग्रह के दर्शन होंगे।


गोमुख

चार धामों की यात्रा में सबसे पहले दर्शन गंगोत्री के होते हैं जहां से मां गंगा की धारा निकलती हैं। इस यात्रा में सबसे अंत में बद्रीनाथ के दर्शन होते हैं जहां साक्षात भगवान विष्णु निवास करते हैं। भगवान विष्णु का धाम बद्रीनाथ दो पहाड़ों के बीच में बसा है जिसका नाम नर और नारायण हैं। कहां जाता है कि यहां भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने कड़ी तपस्या की थी। यहीं नर और नारायण अगले जन्म में अर्जुन और श्री कृष्ण के रूप में धरती पर आए थे। बद्रीनाथ की यात्रा में पहली बार गंगोत्री के दर्शन होते हैं और फिर यमुनोत्री मंदिर के दर्शन होते हैं। यह मंदिर देवी यमुना का मंदिर माना जाता है। इस मंदिर के दर्शन के बाद केदारनाथ मंदिर के दर्शन होते हैं।