बीते मंगलवार अमेरिका में भारत को लेकर एक रिपोर्ट जारी की गई, जिसमें भारत के मानवाधिकारों से संबंधित कई अहम मुद्दों के बारे में कहा गया है। जिनमें अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्रता पर पाबंदी, भ्रष्टाचार और धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन की सहनशीलता से लेकर गैरकानूनी हत्याओं को भी शामिल किया गया है।

अमेरिका के '2020 कंट्री रिपोर्ट्स ऑन ह्यूमन राइट्स प्रैक्टिसेज' की रिपोर्ट के मुताबिक भारत देश में सरकार के ख़िलाफ़ आलोचनात्मक खबरें लिखने वाली मीडिया पर सरकार या उनके नुमाइंदों द्वारा दबाव डाला जा रहा है और प्रताड़ित किया जा रहा है।

रिपोर्ट में प्रेस फ्रीडम को लेकर भी कुछ बातें कही गई हैं। रिपोर्ट में लिखा है कि वैसे तो भारत सरकार प्रेस फ्रीडम की ज़रूरत का समर्थन करती है लेकिन ऐसे कई मामले देखे गए हैं, जहां सरकार खुद या तो उनके करीबी लोगों द्वारा आलोचनात्मक खबरें लिखने वाली मीडिया को विभिन्न तरीकों से दबाने की कोशिशें कर रही है- चाहे वह ऑनलाइन ट्रोलिंग हो या फिर कानूनी कार्रवाई।

इसमें आगे यह भी कहा गया है कि प्रशासन मीडिया की आवाज़ को दबाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा, मानहानि राजद्रोह, हेट स्पीच कानून के साथ-साथ अदालत की अवमानना जैसे कानूनों का सहारा ले रही है।

अमेरिकी रिपोर्ट ने अपनी बातों को स्पष्ट करने के लिए द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन का भी जिक्र किया है, जिनके खिलाफ़ महज़ एक टि्वटर पोस्ट को लेकर उत्तर प्रदेश की सरकार ने केस दर्ज करा दिया था।

इस टि्वटर पोस्ट में वरदराजन ने कहा था कि उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान जितने भी धार्मिक आयोजन हुए हैं उनकी रक्षा भगवान करेंगे। हालांकि वरदराजन ने बाद में इस ट्वीट को लेकर स्पष्टीकरण किया था कि योगी आदित्यनाथ ने ऐसा कुछ नहीं कहा था, लेकिन इसके बावजूद भी उनके खिलाफ आईटी एक्ट, आईपीसी, आपदा प्रबंधन अधिनियम और महामारी बीमारी अधिनियम की विभिन्न धाराएं लगाकर मामला दर्ज कर दिया गया था।

इसके अलावा गुजराती समाचार पोर्टल 'फेस ऑफ द नेशन' के संपादक धवल पटेल का भी जिक्र किया गया है। उन्होंने गुजरात में बढ़ते कोरोना वायरस मामलों की आलोचना के कारण नेतृत्व परिवर्तन का सुझाव देने वाली एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसी मामले में पिछले साल 11 मई को धवल पटेल पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया था।

इनके अलावा रिपोर्ट में स्क्राॅल.इन की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा का भी उल्लेख किया गया है। उनके खिलाफ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में लॉकडाउन की स्थिति पर की गई उनकी रिपोर्ट के खिलाफ केस दर्ज किया गया था।  उन पर एससी/एसटी एक्ट और आईपीसी की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

रिपोर्ट में कारवां पत्रिका के तीन पत्रकारों पर दिल्ली दंगों की रिपोर्टिंग के दौरान हुए हमले का भी विवरण किया गया है, जिसमें पुलिस ने इस हमले की एफ आई आर तक दर्ज नहीं की थी।

इतना ही नहीं अमेरिकी विदेश विभाग ने भारत के एक दर्जन से भी अधिक मानवाधिकारों से जुड़े अहम मुद्दों को अपने इस रिपोर्ट में सूचीबद्ध किया है। जिनमें प्रमुख रूप से पुलिस द्वारा गैर न्यायिक हत्याओं समेत अवैध कत्ल, कुछ पुलिस और जेल अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित करना, क्रूरता, मानवीयता या अपमानजनक व्यवहार या सजा के मामले, सरकारी अधिकारियों द्वारा मनमानी गिरफ्तारियां और कुछ राज्यों में राजनीतिक कैदी जैसी चीजें शामिल है।

बता दें कि इससे पहले भी अमेरिका के वित्तपोषित गैर सरकारी संगठन 'फ्रीडम हाउस' ने एक रिपोर्ट जारी किया था। जिसमें यह दावा किया गया था कि भारत में नागरिक स्वतंत्रताओं का लगातार क्षरण हुआ है और साथ ही संगठन ने भारत के दर्जे को घटाकर 'आशंकित रुप से स्वतंत्र' की श्रेणी में डाल दिया है। हालांकि भारत इस रिपोर्ट को सरासर गलत, भ्रामक और अनुचित करार दे चुका है।